निरंकुश साहित्य
Monday, 9 November 2015
विकास के नाम पर
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कभी कल कारखाने कभी बड़े बांध कभी खदान उजाड़े जा रहे हैं पुरखों के बसे बसाए गाँव उजाड़ने के पश्चात नहीं सोचते उजाड़ने वाले कहाँ बसेंगे ये उजड़े...
सखुआ
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दूर दूर तक फैला जंगल किस्म किस्म के पेड़-पौधे इन सबके बीच अपनी सांस्कृतिक पहचान लिए खड़ा सखुआ। सखुआ पेड़ पर सिंगबोंगा का वास आतिथ्य सत्कार मे...
आदिवासी
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झारखण्ड हरा - भरा प्रदेश आकर्षित करती प्राकृतिक छटा चट्टानी पर्वत कल - कल छल - छल नाद कर प्रवाहित होती सर्पीली नदियाँ पहाड़ों को चीरकर कर्...
काला अध्याय
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अंकित हो गया काले अध्याय का इतिहास हमारे देश का सबसे शर्मनाक दिन चौबीस नवम्बर दो हजार सात आदिवासियों के खून के छींटे नंगी औरतों का च...
Saturday, 7 November 2015
पहाड़ पर
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आतंकियों का डेरा अब जमता पहाड़ पर। चैन और सुकून नहीं अब है पहाड़ पर।। बारूद, बम, बन्दूक या फिर जानलेवायन्त्र। अक्सर ही मिला ...
जंगल
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हिंसक जन्तुओं से दूर अब हो रहा जंगल। आतंकियों के जाल में घिर रहा जंगल।। बारूद बम बंदूक अब शहर से हुए दूर। जानलेवा अस्त्र-...
स्वर्णरेखा बहती रही
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अब अचानक गुनगुनाते शालवन जलने लगे किन्तु उनके पाँवो से लिपटी नदी बहती रही। पर नदी के पास भी अपनी सुलगती पीर है आ...
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