निरंकुश साहित्य
Friday, 6 November 2015
उलगुलान
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झारखण्ड में झारखण्ड के नेतृत्वकर्ता नहीँ रहे दुखहर्ता बन गए तिजोरिभर्ता उनमे नही रहा कुछ करने का छोह भूल गए उलगुलान आदिवासी विद्रोह आदिवासी...
जन जातीय संस्कृति
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षड़यंत्र का परिणाम उजड़ रहे वन त्रस्त हो रहा मन बुन रहा कोई भय भरा जंजाल आदिवासियों को इसका अन्तः से है मलाल चली गई वह सुगंध महुआ और डोरी की ...
पर्यटन स्थल पर
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सूरज के दस्तक से शरद ऋतु में अलसाई आँखों में झरती है दिन भर की मुस्कराहट। मौसम के दस्तक से वृक्ष संवरते हैं चाँद की दस्तक से भाग जाता...
Tuesday, 3 November 2015
मेरे बच्चे
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मैं चिंतित और उदास हूँ छूट रही है मेरे बच्चों से इस धरती की बहुत सारी चीजेँ जिन्हें वो शायद ही जान पाये। बन्द कोठरी में आँख खुलते ही...
अच्छा लगता है
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शरद ऋतू आते ही अच्छा लगता है हर दिन। दिन तैरता है झील सी आँखों में रंग बिरंगे फूल बांसों की झुरमुट में पेड़ों की डालियों पर चिड़ियों का चहकना...
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