Monday, 10 February 2020

आंगन की गौरैया


आज बहुत खुश हैं
खुश क्यों न हों
उनके बाबा भी खुश हैं
देखकर अपनी
आंगन की गौरैया को
नाम की महिमा को
साकार कर दिया
अपने आंगन में
मुक्ति ने।
नामकरण संस्कार में
रखे गए नाम की
एक गरिमा होती है
ईश्वर की अद्भुत महिमा होती है
एक एक शब्द पिरो कर
अपनी भावनाओं को
संवेदनाओं को
कविता के रूप में
परोस दिया है
पुस्तकाकार में
जिसमें समाहित है
परिवेश की सारी स्थितियां
बदलते ऋतु रंग की  परिस्थितियां
समेटकर
सहेज कर
जीवन के कैनवास पर उकेर कर
श्री श्री जगन्नाथ जी के समक्ष
मेरी आत्मा को
आज मिल गई
मुक्ति
मेरी ही लाड़ली,  प्यारी,
गौरैयामुक्तिं के द्वारा।
धन्य हुआ मै
......अरे हां !
मैंने देखा है उसे
बचपन से ही
अपने पंख को फैलाकर
मेरी खुशी के साथ साथ
परिवार के सदस्य तक ही नहीं
आस पास के सभी के प्रति
स्नेह लुटाती, मुस्कुराती, इठलाती
अपनी गौरैया को।
उसी का तो परिणाम है
प्रातः की बेला में
सुनहरी रश्मियां विकीर्ण कर
प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित होकर
आईं यह पुस्तक
" आंगन की गौरैया "।
          ****

इससे पहले कि


इससे पहले कि
मुझसे कुछ कहो
यह जान लो
मैं लाड़ला हूँ माँ का
सुपुत्र हूँ पिता का
शान हूँ परिवार का
स्वाभिमानी हूँ घर बार की।

मेरे अरमान
मेरी चाहत
असीमित है
जानकर भी तुम
नहीं जान पाओगे
मेरी अस्मिता
नहीं पहचान पाओगे
प्रकृति प्रदत्त हैं
मेरा कद
मेरी बलिष्ठ भुजाएं
चेहरे पर चेचक के दाग़
मेरी सृजन शक्ति
निरंकुश के नाम
मेरी कविताएं
मेरा मृदुल स्वभाव
मेरे प्रति औरों का आकर्षण
मेरी सारी खूबियाँ
कितना गिनाऊँ
इससे पहले कि.....

मेरी सांसों में
भारत माता की जयकार है
भारतीय सैनिकों से प्यार है
स्वयं मिटकर जो
दूसरे को संवार दे
राष्ट्र के प्रति प्यार दे
दुश्मन देखकर थर्राए
हिम्मत कहाँ जो आँख मिलाए
मैं राष्ट्रीयता की पुकार हूँ
समझ गए न
इससे पहले कि .....

तुम्हारी क्या चाहत है
आँखों की डोरी बता रही है
मेरी आत्मा मुझे चेता रही है
यहाँ नहीं मिलेगा पनाह
कुछ नहीं कर पाएगा
धारदार निगाह
पीछा छोड़ दो मेरा
इतना जान लो
इससे पहले कि .....

प्रशंसा सुनते सुनते
पक गए हैं मेरे कानं
एक भी शब्द नहीं बोलेगा
मेरा जुबान
कभी नहीं टूटेगा
मेरा अरमान
मैं काव्यकार हूं
रचनाकार हूं
भारतीय साहित्य की
अमिट हूँ शब्दकार हूं
यह मान लो
इससे पहले कि .....
       *****
  शिल्पी कुमारी "सुमन"

Sunday, 9 February 2020

आगे ही बढ़ना है


एक एक अक्षर को समेटकर
शब्दों को एकजुट कर
वाक्यों को पंख बनाकर
फैले असीमित गगन में
मुझे दूर तक उड़ना है
बढ़ते जाए कदम
कभी नहीं रुकना है
आगे ही बढ़ना है।

हसरतें बड़ी पंख छोटे हैं
रास्ता कठिन तेज झोंके हैं
पथ पर इधर उधर
कैक्टस के कांटे हैं
लाभ हानि क्यों देखूं
घाटे ही घाटे हैं
धरा से गगन तंक
मुझे बस जुड़ना है।
कभी नहीं रुकना है
आगे ही बढ़ना है।।

बागों में बहुत कलियाँ हैं
कुछ झरती हैं कुछ खिलती हैं
तेज हवा के झोकों से
इधर उधर गिरती हैं
तूझे गिरना या झरना नहीं
तूझे तो खिलना है।
कभी नहीं रुकना है
आगे ही बढ़ना है।।

तुम 'सुमन' हो पर
नहीं होने दो अहसास
प्रच्छन्न प्रतिभाएँ
दे रही तेरा साथ
कदमों से नापोगी
पूरा आकाश
मुझे लक्ष्य पर अटल रहना है।
कभी नहीं रुकना है
आगे ही बढ़ना है।।

आ रहे हैं अवरोध
पर दूर तक बहना है
रूखी सूखी खा बड़ी हुई
दुर्गम पर्वत पर चढ़ना है
ऊर्जा है बहुत तुझमे
कभी नहीं डरना है।
कभी नहीं रूकना है
हां आगे ही बढ़ना है।
आगे ही बढ़ना है।
       *****

उसी के खातिर


प्यार
लगाव
अपनापन
बढ़ता जाता है
किसी और के खातिर
कुछ न कुछ
करने की ललक
सीमा लाँघकर भी
अपना होंने के कारण
उसे अपना समझने के कारण
विश्वास था मुझे
और उसे भी
एक दूसरे पर
फिर
दुराग्रह क्यों
अविश्वास क्यों
एक ही झटके में
सब का सब
चूर चूर
क्या इसकी कड़ी
इतनी कमजोर
सत्यता जानने हेतु
दिल और दिमाग पर
अगर लगाते जोर
सामने दीख पड़ता
अविश्वास का बना हुआ
पहाड़
स्वयं पर
अपनी सोच पर
आस्था
विश्वास
करना ही होगा
अपना अगर झूठ भी
कभी कभार बोल दे
तो उसने छिपी होती है
भलाई
हित
उसी की खातिर
जिसे चाहा है
माना है
हृदय से
सच्चे मन से
अपना मानकर
सबकुछ तुम्ही हो
यही जानकर !
     ★★★
©  °#कामेश्वर_निरंकुश

जीवन



जीवन में शुन्यता या
शुन्यता में जीवन
उड़ान भरता
वायुयान
जमीन छोड़
विस्तृत आकाश में
तेज रफ्तार से
गंतव्य तक
पहुँचाने में
बादलों को चीरते हुए
ऊपर जाने पर
हुआ अहसास
शुन्यता का
कहीं कुछ भी नहीं
केवल बादलों का समूह
अलग अलग आकार में
नदी पहाड़ जंगल
पक्षी कहीं भी नहीं
कोई भी जीव नही
आँखों के सामने
तैरता अमंगल
शुन्य शुन्यता
फ़ैल गया
जीवन का क्या मोल
कौन सकेगा तौल।
     ★★★
©   #कामेश्वर_निरंकुश

वसन्त


यह   देवों   का   क्रीड़ास्थल
देवीकुल    की       रंगशाला ।
जहाँ स्वच्छ्ता परिचारक था
शीतल     मारुत    मतवाला ।।

पतझड़ का कभी  प्रवेश नहीं
हेमंत -  उष्ण  भी   डरते   थे ।
जहाँ  सदा  ऋतुराज  अकेले
राज्य    अकंटक    करते  थे ।।

यहीं ' तेनज़िंग ' संग  हिलेरी
मधुमय    रात    बिताई   थी ।
और  छीन जल  मेघसुतों से
अपनी    प्यास   बुझाई   थी ।।

देव  हिमालय  के आंगन  में
समता  का  शुभ  राज  जहाँ ।
नाचा  करती  थी  अलिवामा
धूम   मची   थी   जहां - तहाँ ।।

आशा  की किरणों को  लेकर
छाई     उषा      की      लाली ।
कर    में   मधुमय   दीप    धरे
छाई    वसंत   की    हरियाली ।।
               *****
        @   #  कामेश्वर  निरंकुश।

ललक के बिना


कुछ नहीं
ललक के बिना
हम खुद पर ध्यान दें
कोई टीस
कोई ललक
हमारे भीतर से ही उठती है
यह ललक ही
मुझे आगे ले जाएगी
यह टीस ही
मुझसे कुछ बेहतर करवा लें जाएगी
भीतर से उठने वाली आवाज को शब्द दें
एक एक शब्द को गूंथते जाएं3
अगर हमें खारिज होना
और करना आता है तो
हम जरूर सफल होंगे
बेहतर करने के लिए
जरूरी है
स्थिरता
प्रतिबद्धता
धैर्य की आवश्यकता
नए साल में नया काम करें
पर पुराना न छोड़ें
पुराना काम खतम करने के बाद
नया काम में पैर रखने की
मजबूत जगह मिलने के बाद ही
पुराना छोड़े।
नए वर्ष में अपनी लेखनी को
उसी ओर मोड़ें।
                   ★★★
       © #कामेश्वर_निरंकुश