Sunday, 9 February 2020

आगे ही बढ़ना है


एक एक अक्षर को समेटकर
शब्दों को एकजुट कर
वाक्यों को पंख बनाकर
फैले असीमित गगन में
मुझे दूर तक उड़ना है
बढ़ते जाए कदम
कभी नहीं रुकना है
आगे ही बढ़ना है।

हसरतें बड़ी पंख छोटे हैं
रास्ता कठिन तेज झोंके हैं
पथ पर इधर उधर
कैक्टस के कांटे हैं
लाभ हानि क्यों देखूं
घाटे ही घाटे हैं
धरा से गगन तंक
मुझे बस जुड़ना है।
कभी नहीं रुकना है
आगे ही बढ़ना है।।

बागों में बहुत कलियाँ हैं
कुछ झरती हैं कुछ खिलती हैं
तेज हवा के झोकों से
इधर उधर गिरती हैं
तूझे गिरना या झरना नहीं
तूझे तो खिलना है।
कभी नहीं रुकना है
आगे ही बढ़ना है।।

तुम 'सुमन' हो पर
नहीं होने दो अहसास
प्रच्छन्न प्रतिभाएँ
दे रही तेरा साथ
कदमों से नापोगी
पूरा आकाश
मुझे लक्ष्य पर अटल रहना है।
कभी नहीं रुकना है
आगे ही बढ़ना है।।

आ रहे हैं अवरोध
पर दूर तक बहना है
रूखी सूखी खा बड़ी हुई
दुर्गम पर्वत पर चढ़ना है
ऊर्जा है बहुत तुझमे
कभी नहीं डरना है।
कभी नहीं रूकना है
हां आगे ही बढ़ना है।
आगे ही बढ़ना है।
       *****

उसी के खातिर


प्यार
लगाव
अपनापन
बढ़ता जाता है
किसी और के खातिर
कुछ न कुछ
करने की ललक
सीमा लाँघकर भी
अपना होंने के कारण
उसे अपना समझने के कारण
विश्वास था मुझे
और उसे भी
एक दूसरे पर
फिर
दुराग्रह क्यों
अविश्वास क्यों
एक ही झटके में
सब का सब
चूर चूर
क्या इसकी कड़ी
इतनी कमजोर
सत्यता जानने हेतु
दिल और दिमाग पर
अगर लगाते जोर
सामने दीख पड़ता
अविश्वास का बना हुआ
पहाड़
स्वयं पर
अपनी सोच पर
आस्था
विश्वास
करना ही होगा
अपना अगर झूठ भी
कभी कभार बोल दे
तो उसने छिपी होती है
भलाई
हित
उसी की खातिर
जिसे चाहा है
माना है
हृदय से
सच्चे मन से
अपना मानकर
सबकुछ तुम्ही हो
यही जानकर !
     ★★★
©  °#कामेश्वर_निरंकुश

जीवन



जीवन में शुन्यता या
शुन्यता में जीवन
उड़ान भरता
वायुयान
जमीन छोड़
विस्तृत आकाश में
तेज रफ्तार से
गंतव्य तक
पहुँचाने में
बादलों को चीरते हुए
ऊपर जाने पर
हुआ अहसास
शुन्यता का
कहीं कुछ भी नहीं
केवल बादलों का समूह
अलग अलग आकार में
नदी पहाड़ जंगल
पक्षी कहीं भी नहीं
कोई भी जीव नही
आँखों के सामने
तैरता अमंगल
शुन्य शुन्यता
फ़ैल गया
जीवन का क्या मोल
कौन सकेगा तौल।
     ★★★
©   #कामेश्वर_निरंकुश

वसन्त


यह   देवों   का   क्रीड़ास्थल
देवीकुल    की       रंगशाला ।
जहाँ स्वच्छ्ता परिचारक था
शीतल     मारुत    मतवाला ।।

पतझड़ का कभी  प्रवेश नहीं
हेमंत -  उष्ण  भी   डरते   थे ।
जहाँ  सदा  ऋतुराज  अकेले
राज्य    अकंटक    करते  थे ।।

यहीं ' तेनज़िंग ' संग  हिलेरी
मधुमय    रात    बिताई   थी ।
और  छीन जल  मेघसुतों से
अपनी    प्यास   बुझाई   थी ।।

देव  हिमालय  के आंगन  में
समता  का  शुभ  राज  जहाँ ।
नाचा  करती  थी  अलिवामा
धूम   मची   थी   जहां - तहाँ ।।

आशा  की किरणों को  लेकर
छाई     उषा      की      लाली ।
कर    में   मधुमय   दीप    धरे
छाई    वसंत   की    हरियाली ।।
               *****
        @   #  कामेश्वर  निरंकुश।

ललक के बिना


कुछ नहीं
ललक के बिना
हम खुद पर ध्यान दें
कोई टीस
कोई ललक
हमारे भीतर से ही उठती है
यह ललक ही
मुझे आगे ले जाएगी
यह टीस ही
मुझसे कुछ बेहतर करवा लें जाएगी
भीतर से उठने वाली आवाज को शब्द दें
एक एक शब्द को गूंथते जाएं3
अगर हमें खारिज होना
और करना आता है तो
हम जरूर सफल होंगे
बेहतर करने के लिए
जरूरी है
स्थिरता
प्रतिबद्धता
धैर्य की आवश्यकता
नए साल में नया काम करें
पर पुराना न छोड़ें
पुराना काम खतम करने के बाद
नया काम में पैर रखने की
मजबूत जगह मिलने के बाद ही
पुराना छोड़े।
नए वर्ष में अपनी लेखनी को
उसी ओर मोड़ें।
                   ★★★
       © #कामेश्वर_निरंकुश

स्वेटर से बुनी कविता.


 लैपटॉप पर
अक्षरों का चयन कर
मन के भावों को
शब्दों में पिरोकर
कविता सृजित करनेवाली
हाथ की उंगलियां
ठंढ से ठिठुरते
वृद्धावस्था में रिक्शा खींचते
उस महामानव को देखकर
उसी कवयित्री ने
हाथ से पकड़े पैकेट से
अपनी उंगलियों से बुने हुए
एक स्वेटर निकाला
रिक्शावाले के हाथों में थमाकर
कहने लगी
पहनकर बताओ गर्म है क्या ?
भौचक्के खड़े रिक्शेवाले ने हामी भरी
कवयित्री मन ही मन खुश हुई
बुदबुदाई आज मैंने
सही अर्थों में उंगलियों से
एक गरीब की खुशी के लिए
कविता गढ़ी है !
क्या आपने ऐसी कविता कभी पढ़ी है ?
              ★★★
      #कामेश्वर_निरंकुश

आजाद हिंद फौज



आजाद हिंद फौज की सेना दुश्मन से थी लोहा लेती।
किसी  घोर  संकट में भी  वह  थी अपनी  सेवा देती।।
हमें  गर्व  है  उस  सेना  पर , बड़ा  काम  था  उसका।
और  काम  के बल  पर ही तो, बड़ा  नाम था उसका।।

आजाद हिंद  सेना के जवान थे धीर, वीर  बलशाली।
सिर में कफ़न  बांधकर करते थे भारत की रखवाली।।
भीषण  गर्मी  में, कड़क  ठंढक में और  घोर  वर्षा में,
उनकी  मनती  थी  होली , उनकी  मनती  थी दीवाली।।

पर्वत  पर  भी  रहते  थे,  घाटी में , खंदक  खाई  में।
डुबकी  लेते  थे  महासिंधु  की , निस्तल  गहराई  में।
उनकी थी  सेना जल में, थल में, और थी वायु में भी,
पल  में  थे जाते  ऊपर और वे , नभ  की  ऊँचाई  में।।

भारत  माँ  के  बेटे  थे आजाद  हिन्द  फौज  के  बेटे।
कभी  खड़े  होकर  लड़ते  थे और  कभी  वे लेटे लेटे।।
वे  अप्रतिम  वीर   जवान  थे , वे  रण  में  अर्जुन  थे,
नेताजी  सुभाष  के  नेतृत्व  में , उनके  धुन  थे पक्के।।

बंदूकों,   तोपों   के  आगे   डटे   खड़े   वे   रहते  थे।
और  वर्फ़  की  चादर  ओढ़े  कहीं  भी  पड़े  रहते थे।।
उनका  साहस  अतुलनीय  था , और  इरादे  थे पक्के।
दुश्मन  से  लोहा  लेते थे , और  उनके  छुड़ाते  छक्के।।
             
       आज नेताजी के जन्म दिन पर उन्हें कोटि कोटि नमन।
                                   ★★★