Friday, 18 November 2016

और हम हैं



हर  तरफ़ खामोशियाँ हैं और  हम  हैं।
अँधेरी    बस्तियाँ      हैं  और  हम  हैं।।

साथ   कोई  हो  न   हो   अपना  यहाँ,
बेवजह    मस्तियाँ    हैं  और  हम  हैं।।

कलम कागज़ और  सियाही  खून की,
गीत  ग़ज़ल रुबाइयाँ हैं  और  हम  हैं।।

रस्में - इन्सां  और मज़हब है रिवाजों में
बस  वही  बैसाखियाँ हैं  और  हम  हैं।।

सुलझा न पाया लाख कोशिश की यहाँ
उलझी  हुई  गुत्थियाँ हैं  और  हम  हैं।।

इसको  कहूँ  मैं बदनसीबी या  'निरंकुश'
यह  हमारी  गलतियाँ हैं  और  हम  हैं।।
                                  ---  निरंकुश ।

अक्षर



अक्षर ब्रह्म है
अक्षर अक्षर साथ मिलकर बनते हैं शब्द
शब्द शब्द एकजुट हो
वाक्य में ढल जाता है
वाक्य अनुभूति को
आरम्भ से श्रीइति तक
जन-जन के हृदय में ले आता है
सद्ग्रन्थ यही दर्शाता है
साहित्य में वर्णित
भूत में घटित
भविष्य में कोई न हो चकित
हृदय में अंकित होता साकार
साकारता नए आकार का
आकार ज्ञान-विज्ञान का
सज्ञान है नव-विहान का
यही आकार
हृदय में करता दीप प्रज्जवलित
टीम स्वतः तिरोहित होकर
ज्योतिपुंज बनकर
परमेश्वर की महिमा बताता है
ब्रह्म के स्वरूप को दर्शाता है
अक्षर यही तो दर्शाता है।
         *****
              कामेश्वर निरंकुश।

साँपों का डेरा



हर  जगह  जहाँ  तहाँ  साँपों  का  डेरा  है।
बजा  बजा  कर  बीन  साँपों  को  घेरा  है।।

काल के बिकराल सा विष फैला चारो  ओर,
क्यों  नहीं  कहते  यह  तेरा  नहीं  मेरा  है।।

वही  फुफकार  रहा  फन  को  उठाए  हुए,
लाड़ प्यार से जो  हाथ  बार  बार  फेरा है।।

भर  कटोरा  दूध  वह  रोज  गटकता  रहा,
भूल  गया वह यह  उसी  का  ही  डेरा  है।।

'निरंकुश' आहत  है  साँपों  की  बस्ती  में,
छोड़े  अब   कैसे  यह  मेरा  ही  डेरा  है ।।
                   *****
                           

साँपों का डेरा



हर  जगह  जहाँ  तहाँ  साँपों  का  डेरा  है।
बजा  बजा  कर  बीन  साँपों  को  घेरा  है।।

काल के बिकराल सा विष फैला चारो  ओर,
क्यों  नहीं  कहते  यह  तेरा  नहीं  मेरा  है।।

वही  फुफकार  रहा  फन  को  उठाए  हुए,
लाड़ प्यार से जो  हाथ  बार  बार  फेरा है।।

भर  कटोरा  दूध  वह  रोज  गटकता  रहा,
भूल  गया वह यह  उसी  का  ही  डेरा  है।।

'निरंकुश' आहत  है  साँपों  की  बस्ती  में,
छोड़े  अब   कैसे  यह  मेरा  ही  डेरा  है ।।
                   *****
                           ---  निरंकुश। डेरा

हर  जगह  जहाँ  तहाँ  साँपों  का  डेरा  है।
बजा  बजा  कर  बीन  साँपों  को  घेरा  है।।

काल के बिकराल सा विष फैला चारो  ओर,
क्यों  नहीं  कहते  यह  तेरा  नहीं  मेरा  है।।

वही  फुफकार  रहा  फन  को  उठाए  हुए,
लाड़ प्यार से जो  हाथ  बार  बार  फेरा है।।

भर  कटोरा  दूध  वह  रोज  गटकता  रहा,
भूल  गया वह यह  उसी  का  ही  डेरा  है।।

'निरंकुश' आहत  है  साँपों  की  बस्ती  में,
छोड़े  अब   कैसे  यह  मेरा  ही  डेरा  है ।।
                   *****
                           ---  निरंकुश।

Saturday, 22 October 2016

प्रेम



अंतर्निहित है प्रेम में
आखर आखर चाह
प्रेम का दुर्गम है राह
प्रेम में नही होता अपवाद
प्रेम का अनहद नाद
प्रेम एक शब्द
एक अनुभूति
एक जीवन
एक धड़कन
एक प्रतीक्षा
एक राग
एक सुबह
एक धुन
एक उड़ान
एक यात्रा
एक संसार
एक अंतर्भाव
एक तड़प
एक प्यास
एक आश
एक पुकार
एक चेहरा
एक बोल
एक याद
कितना अपार
कितना अपरुप
व्यास है
प्रेम के वृत्त का
बंधता ही नहीं भाषा में
जीवन में ही
कहाँ बंध पाता है प्रेम
प्रेम के हवा में कोई राग है
प्रेम में आग है।
    *****
      ---- कामेश्वर निरंकुश

गाँव


कितना बदल गया है
मेरा वही पुराना गाँव !

ड्योढ़ी पर दादी का अभाव
आँगन  से बुआ  का लगाव
घर में दीदी का कूद- फाँद
गुम हो गया छत  का चाँद
छुट्टी   में  घर  आने  पर
यहीं सबका जमता था पाँव!
कितना बदल गया है
मेरा वही पुराना गाँव !!

बूढा बरगद अब है उदास
कोई नहीं दीखता आसपास
सूना वीरान लगता दालान
घर के लोगों का नहीं ध्यान
मुखिया सरपंच नहीं दीखते
कहाँ गई बरगद की छाँव !
कितना बदल गया है
मेरा वही पुराना गाँव !!

बाग-बगइचा ठाकुरबाड़ी
जहाँ मिलते थे बारी-बारी
जाति-पाँति का भेदभाव
अर्थहीन गप काँव- काँव
धीर-े धीरे नासूर बन रहा
ऊँच-नीच का उभरा घाव !
कितना बदल गया है
मेरा वही पुराना गाँव !!

बाबा की छड़ी खड़ाऊँ
ताक रही है कोने से
दादी का ऐनक- चिलम
पूजा थाल बिन धोने से
तुलसी का चौरा लीपे बिना
खुद बता रहा है हाव् भाव !
कितना बदल गया है
मेरा वही पुराना गॉंव !!

झाल, मंजीरा, दन्ताल, ढोल
सुनने मिलती घर घर की पोल
फगुआ, चैती के मधुर गीत
नही मिलते पहले सा मीत
खेत खलिहान में राजनीति की
बहस छिड़ी है ठांव  कुठांव !
कितना बदल गया है
मेरा वही पुराना गाँव !!
            ****

गाँव



कितना बदल गया है
मेरा वही पुराना गाँव !

ड्योढ़ी पर दादी का अभाव
आँगन  से बुआ  का लगाव
घर में दीदी का कूद- फाँद
गुम हो गया छत  का चाँद
छुट्टी   में  घर  आने  पर
यहीं सबका जमता था पाँव!
कितना बदल गया है
मेरा वही पुराना गाँव !!

बूढा बरगद अब है उदास
कोई नहीं दीखता आसपास
सूना वीरान लगता दालान
घर के लोगों का नहीं ध्यान
मुखिया सरपंच नहीं दीखते
कहाँ गई बरगद की छाँव !
कितना बदल गया है
मेरा वही पुराना गाँव !!

बाग-बगइचा ठाकुरबाड़ी
जहाँ मिलते थे बारी-बारी
जाति-पाँति का भेदभाव
अर्थहीन गप काँव- काँव
धीर-े धीरे नासूर बन रहा
ऊँच-नीच का उभरा घाव !
कितना बदल गया है
मेरा वही पुराना गाँव !!

बाबा की छड़ी खड़ाऊँ
ताक रही है कोने से
दादी का ऐनक- चिलम
पूजा थाल बिन धोने से
तुलसी का चौरा लीपे बिना
खुद बता रहा है हाव् भाव !
कितना बदल गया है
मेरा वही पुराना गॉंव !!

झाल, मंजीरा, दन्ताल, ढोल
सुनने मिलती घर घर की पोल
फगुआ, चैती के मधुर गीत
नही मिलते पहले सा मीत
खेत खलिहान में राजनीति की
बहस छिड़ी है ठांव  कुठांव !
कितना बदल गया है
मेरा वही पुराना गाँव !!