Wednesday, 12 June 2013

बाप रे बाप



क्रिकेट खेल में
खिलाड़ी द्वारा
एक ओभर में साठ लाख
वाह रे सटोरिया
वाह रे सट्टाबाज
बाप रे बाप

यह और बात है
वे फँस गए हैं आज
बीता हुवा कल फिर आता है
और कलंकित कर जाता है
कोई खेल ख़राब नहीं होता
परन्तु ऐसा न हो
क्रिकेट के खेल से
अपने जीवन का खेल ख़राब हो जाए

बड़े लोगों द्वारा प्रायोजित क्रिकेट खेल में
सटोरिये सट्टेबाज पर
बनाया जाए सख्त कानून
ख़त्म हो जाए धनार्जन का जुनून
नेताओं और उद्योगपतियों द्वारा
खेल को व्यवसाय न बनाया जाय
उनकी खेल में पनप रही पैठ को हटाया जाय

खेल शारीरिक क्षमता बढ़ाने
साहस निर्माण
बौद्धिक विकास
आत्म-संयम
सामाजिक समरसता के
संपोषण में सहायक होता है
खेल एकता भाईचारा स्वस्थ मनोरंजन
का सबक सिखाता है
खिलाडियों और दर्शकों के बीच
अपनापन बढ़ाता है

जनता समझ गयी
क्रिकेट खेल है पतंग
बड़े बड़े पूंजीपति हैं पतंगबाज़
वही हैं सटोरिए सट्टेबाज़
वे धनाढ्य हो गए
एक ही खेल में अपने आप 
वाह रे सटोरिया
वाह रे सट्टाबाज
बाप रे बाप

भर गया है ग्लास



टेबुल  पर नेताओं  के भर गया है  ग्लास
भ्रष्टाचार से  लबालब  भर गया  है ग्लास

बाहुबली  माफिया लुटेरों के  हाथ पड़कर
चियर्स के  बोल पर  टकरा  रहा है ग्लास

फिस चिकन  मटन के  साथ रोज रात में
व्हिस्की रम से  नशा  बढ़ा  रहा है ग्लास

भूना काजू बादाम पिस्ता रखा है मेज पर
नेताओं के होंठ से वहाँ सट  रहा है ग्लास

उत्तेजक  वस्त्रों  में थिरकती  हैं कॉल  गर्ल
मदभरी नशा  के लिए भरा  पड़ा है ग्लास

सत्य अहिंसा  प्रेम की जगह  नहीं यहाँ है
बलात्कार लूटमार से तड़प  रहा है ग्लास

वोट का  माहौल  ज़ल्द  फिर आ रहा   है
जनता तबाह होगी यह कह रहा है ग्लास 

   

Tuesday, 11 June 2013

नेताजी का प्रश्न



चुनावी माहौल में
लोकतंत्र के प्रतिनिधि
समय निकलकर
दूसरे दावेदारों से आँखे चुराकर
साहित्यकार के निवास पर
मन में उठे प्रश्न का
सही जवाब जानने के लिए आए

साहित्यकार जानता था
जब भी राजनेता
शब्दों के जाल में फँस जाता है
उसे सुलझाने हेतु
 साहित्यकार के पास आता है
राजनीति जब जब लडखडाती है
साहित्य ही उसे बचाता है

नेताजी ने  पूछा
वाद और गिरि का अर्थ बताइए
दोनों में क्या सम्बन्ध होता है
यह भी समझाइए

वाद
सिद्धान्त नियम कानून  सीमा दर्शाता है
गिरि सिद्धान्त के प्रणेता
नियम निर्धारक
क़ानून विशेषज्ञ और
सीमा निर्धारित करनेवाले की बनी हुई राह पर
अपनी कदम बढ़ाता है

वाद के दिन अब लद गए
वाद का सीधा ताल्लुक विचारों से होता है
हम विचारहीन समय में रह रहें हैं
अनायास बिना सोंचे बिचारे
अमानुषिक दुषित हवा में बह रहें हैं

वाद का समर्थक
कभी नहीं करता फ़रियाद
वाद की सीमओं
सिद्धान्तों वसूलों को
हरदम रखता है याद

नेताजी!
पहले गांधीवादी
लाखों की संख्या में मिल जाते थे
जो राष्ट्र के प्रति समर्पित नजर आते थे
लेकिन आज कल वे
उसी तरह अंतर्ध्यान होते जा रहे हैं
जैसे जमीन से गिद्ध
जंगलो से शेर
समुद्र से व्हेल

इस युग में
साम्यवाद
समाजवाद
कलाबाद
रुपवाद
दादावाद की तरह
चमचावाद की हवा
जबरदस्त चल रही है
जनता इन वादों के मकड़जाल में पल रही हैं

आज गिरि का जबरदस्त जमाना है
गिरि को ही सर्वोपरि मना हैं
नेतगिरी
भड़वागिरी
चमचागिरी
हर ओर चल रहा है
इसी में लोकतंत्र पल रहा है
आप भी अपने नाम से
----गिरि चला सकते हैं
वाद को छोड़िये
गिरि चलाइए
सांसद हैं हद तक बढ़ जाइए
यही लोकतंत्र के मजे हैं
मतदान के समय
भिन्न-भिन्न  प्रकार के गिरि से
बाजार आज सजे हैं
नेताजी बिना कहे चुपचाप  
चलते नजर आए
साहित्यकार उन्हें देखकर
धीरे से मुस्कुराये।





   








Sunday, 9 June 2013

बच्चा



बड़ों को देखकर बड़ा होने से डरता है बच्चा
छोटा भले है वह मगर बड़ों से  वह है सच्चा

झूट की धरातल पर खड़े हैं उम्रदराज लोग
बच्चा यह समझता है अभी भी है वो कच्चा

बड़े का घर में रहते हुए  आता अगर  कोई
नहीं हैं झूट सुन उसे लगता नहीं है अच्छा

यहाँ छोटे बड़े का अंतर तो  जानते सभी हैं
बड़े क्यों झूट बोलते नहीं समझ पता बच्चा

रहन-सहन बड़ों का दिन-दिन बदलते देख
अब बनावटी माहौल में पल रहा है  बच्चा  

एक दूजे के लिए



देह रचना की पारम्परिक परिभाषा
और मानकों के अनुरूप
शीरी
लैला
हीर
रूपमती
मंजरी
अनारकली
मस्तानी
वसंत सेना
सोहनी
क्लियोपेट्रा
हेलेना
जोसेफीन
ज्यूलियट
महान रूपवती नहीं थीं

फ़रहाद
मजनू
रांझा
बाज बहादूर
लोरिक
सलीम
बाजीराव
देवदास
चारुदत्त
महिवाल
एंटोनी
पेरिस
नेपोलियन
रोमियो
परम रूपवान
देहयष्टि के लिहाज से
बलिष्ठ पुरुष थे
ऐसी बात नहीं

सभी प्यार के रंग में रंगे थे
प्रेम में एक दूसरे के सगे थे
प्रेम की आन्तरिक बुनावट
उसे निखारती है
सौन्दर्य दिल के भीतर
रोशनी की किरण बनकर दमकता है
खुबसूरती त्वचा के सतह पर नहीं
इसकी गहराई में होता है
प्यार ह्रदय से होता है
प्रेमी इसीमे जीता है
कभी ठंढा नहीं होता है
निष्ठावान ह्रदय
गर्माहट लिए हमेशा
धड़कता  रहता है ह्रदय
प्रेमी के लिए
प्रेमिका के लिए
एक दूजे के लिए . .




Saturday, 8 June 2013

पत्नी

जीवन भर साथ निभाती है पत्नी
पतिश्री की पूरक कहलाती है पत्नी

पति समस्या में उलझ जाये जब भी
उसे झटपट सुलझाती है पत्नी

हर रिश्तों में उसकी झलक दिखती है
बेटी बहन माँ  में वही मिलती है पत्नी

कष्ट सहकर घर को बनाती है मंदिर
सुख का माहौल बस दिलाती है पत्नी

निरंकुश से पूछो पत्नी क्या है होती
गीत ग़ज़ल कविता के शब्दों में पत्नी


Thursday, 6 June 2013

बृद्ध पिता



नहीं रोक सका स्वयं को 
निकल पड़ा 
उमंग उल्लास के साथ 
जो सपने अपने मन में संजोये थे 
उसे साकार करने की लालसा में 
वह वृद्ध पिता । 

आग बरसाती हवा 
तपती धूप 
लू का प्रकोप 
गमछे से सर और मुँह लपेटे 
तर-तर बहता पसीना 
अंगार की तरह जलती जमीन 
हर तरफ सन्नाटा 
दूर तक कोई नहीं 
सुनसान सड़क 
पर उसके कदम गन्तव्य  तक 
पहुँचने के लिए गतिमान 
कहीं - कहीं पेड़ों की छांव तले 
कुछ देर सुस्ताता 
पुनः आगे बढ़ जाता 
वह वृद्ध पिता । 

न तो भूख थी न प्यास 
चिलचिलाती धूप में 
गर्मी से शुष्क गले 
जीभ के निकलते लार से तर करता 
झुर्रीदार चेहरे पर बहते पसीने को 
गमछे से पोंछता 
वात्सल्य रस से ओत प्रोत हो 
वर्षों बाद पुत्र से मिलने को आतुर 
बढ़ता ही जाता 
वह वृद्ध पिता 

अन्ततः पहुँच ही गया 
शहर के बीच 
चमचमाते उस आलीशान भवन में 
सुसज्जित कमरा 
ए सी ऑन 
सोफे पर धंसा वह युवक 
बियर भरे गिलास से 
स्नैक्स के साथ 
टी वी पर आँख गडाए 
एडल्ट मूवी में मग्न 
बेफिक्र उस युवक की नज़र 
ज्यों ही पिता पर पड़ी 
उसने धिक्कारा 
यह कैसी बेवकूफी 
इस वक़्त आपका अचानक आना 
ऐसी देहाती वेश भूषा में 
मेरे स्टेटस पर धब्बा लगाएगा 
इसका ख्याल किये बगैर धमक जाना 
क्या उचित है 
सुनकर हतप्रभ था 
किमकर्तव्यविमूढ था 
अपने पुत्र के समक्ष
वह वृद्ध पिता । 

बीस बरस विदेश में रहने के पश्चात 
शहर में रहने की खबर सुनकर 
नहीं रोक सका था स्वयं को 
अश्रु-कण आँखों से बह निकले 
मन धिक्कारने लगा 
पुत्र मोह को नहीं रोक पाने पर 
करने लगा पश्चाताप 
एक शब्द भी मुह से नहीं निकले 
अनायास लौट पड़े
उसके लड़खडाते कदम 
अपने घर की ओर 
दुखी होकर 
मन ही मन से करने लगा प्रश्न  
कष्ट सहकर जीवन भर पढ़ाने 
सुख सुविधा मुहैय्या कराने 
ऊँचे ओहदे का पद पाने पर 
क्यों खुश था मैं 
कोई प्रत्युतर नहीं सूझा 
क्या सोचा था क्या पाया 
वह वृद्ध पिता।