Saturday, 8 June 2013

पत्नी

जीवन भर साथ निभाती है पत्नी
पतिश्री की पूरक कहलाती है पत्नी

पति समस्या में उलझ जाये जब भी
उसे झटपट सुलझाती है पत्नी

हर रिश्तों में उसकी झलक दिखती है
बेटी बहन माँ  में वही मिलती है पत्नी

कष्ट सहकर घर को बनाती है मंदिर
सुख का माहौल बस दिलाती है पत्नी

निरंकुश से पूछो पत्नी क्या है होती
गीत ग़ज़ल कविता के शब्दों में पत्नी


Thursday, 6 June 2013

बृद्ध पिता



नहीं रोक सका स्वयं को 
निकल पड़ा 
उमंग उल्लास के साथ 
जो सपने अपने मन में संजोये थे 
उसे साकार करने की लालसा में 
वह वृद्ध पिता । 

आग बरसाती हवा 
तपती धूप 
लू का प्रकोप 
गमछे से सर और मुँह लपेटे 
तर-तर बहता पसीना 
अंगार की तरह जलती जमीन 
हर तरफ सन्नाटा 
दूर तक कोई नहीं 
सुनसान सड़क 
पर उसके कदम गन्तव्य  तक 
पहुँचने के लिए गतिमान 
कहीं - कहीं पेड़ों की छांव तले 
कुछ देर सुस्ताता 
पुनः आगे बढ़ जाता 
वह वृद्ध पिता । 

न तो भूख थी न प्यास 
चिलचिलाती धूप में 
गर्मी से शुष्क गले 
जीभ के निकलते लार से तर करता 
झुर्रीदार चेहरे पर बहते पसीने को 
गमछे से पोंछता 
वात्सल्य रस से ओत प्रोत हो 
वर्षों बाद पुत्र से मिलने को आतुर 
बढ़ता ही जाता 
वह वृद्ध पिता 

अन्ततः पहुँच ही गया 
शहर के बीच 
चमचमाते उस आलीशान भवन में 
सुसज्जित कमरा 
ए सी ऑन 
सोफे पर धंसा वह युवक 
बियर भरे गिलास से 
स्नैक्स के साथ 
टी वी पर आँख गडाए 
एडल्ट मूवी में मग्न 
बेफिक्र उस युवक की नज़र 
ज्यों ही पिता पर पड़ी 
उसने धिक्कारा 
यह कैसी बेवकूफी 
इस वक़्त आपका अचानक आना 
ऐसी देहाती वेश भूषा में 
मेरे स्टेटस पर धब्बा लगाएगा 
इसका ख्याल किये बगैर धमक जाना 
क्या उचित है 
सुनकर हतप्रभ था 
किमकर्तव्यविमूढ था 
अपने पुत्र के समक्ष
वह वृद्ध पिता । 

बीस बरस विदेश में रहने के पश्चात 
शहर में रहने की खबर सुनकर 
नहीं रोक सका था स्वयं को 
अश्रु-कण आँखों से बह निकले 
मन धिक्कारने लगा 
पुत्र मोह को नहीं रोक पाने पर 
करने लगा पश्चाताप 
एक शब्द भी मुह से नहीं निकले 
अनायास लौट पड़े
उसके लड़खडाते कदम 
अपने घर की ओर 
दुखी होकर 
मन ही मन से करने लगा प्रश्न  
कष्ट सहकर जीवन भर पढ़ाने 
सुख सुविधा मुहैय्या कराने 
ऊँचे ओहदे का पद पाने पर 
क्यों खुश था मैं 
कोई प्रत्युतर नहीं सूझा 
क्या सोचा था क्या पाया 
वह वृद्ध पिता। 

Tuesday, 4 June 2013

वह लड़की



भरे-पूरे घर में
भीड़ में भी स्वयं को
अकेला महसूस करती थी
वह लड़की!

खिड़की के भीतर से
आसमान निहारती
सन्नाटे में डूबे
जेठ की तपती दुपहरी में
गर्म हवा को झेलती
अपने खालीपन को
प्रियतम के होने का
अहसास भरते हुए खड़ी थी
वह लड़की!

वह चाहती थी
प्रिय के साथ आवारा हवा की तरह
धरती की सौंधी सुगंध को
सुंघते हुए उड़ना
चिडियों की तरह फुदकना
फूट पड़े बरसो से शुखा झरना
खिल जाए मन की  कलियाँ  
यही तो चाहती थी
वह लड़की!

बंदिशे
रोका-टोकी
समाज के दिखावी खोखलेपन
परिवार की नकारात्मक प्रवृति
रुढ़िवादिता से टूट चुकी थी
वह लड़की!

प्रियतम से यादों में महफूज़
मुरझा गया है उसका
खिलता गुलाबी चेहरा
कल तक जो खड़ी थी
खिड़की पर
जग जाती थी आहटों से
निढाल होकर
विवश हो कर लेटी है
टूटने वाली ख़ामोशी की चादर ओढ़े
अब नहीं खेलना चाहती
सुनहरी धूप से
झुलस चुकी है किरणों से तपिश से
हार चुकी है
जिंदगी का आखिरी दांव
प्यार करने पर
वह लड़की!

Monday, 3 June 2013

प्रेमी और प्रेमिका



प्रेम में डूबा प्रेमी
प्रेमिका को देखने में आतुर
प्रेमिका अपने प्रेमी के प्रति
सबकुछ समर्पित करने को न्योछावर

प्रेम स्वयंम सौन्दर्य है
सौन्दर्य की परिकाष्ठा है
सौन्दर्य है एक अनुभूति
एक दृश्य
एक दृष्टि

प्रेमिका को देखते ही प्रेमी ने कहा -
तू खुशबू है
ख़ुदा की मुलाकात है
आशिक की सदा है
अल्लाह की रज़ा है
सारी कायनात है
प्रेमिका सुनकर मुस्कराई
प्रेमी के करीब आई और फरमाई
तू खुदा का अंदाज़ है
इश्क की दरगाह है
रूह की आवाज़ है
अज़ल का इकरार है
जोग की राह है
फानी हुस्न का नाज़ है
जग का इनकार है

दोनों का कथन साफ-साफ बताता है
यही तो प्रेम है
सांसो का सांस होना
धडकनों का धड़कन होना
दोनों में प्रेम का ही आगाज़ है
एक साज़ है तो दूसरा आवाज़ है

दोनों ने सौन्दर्य का
सबसे बिराट प्रतिमान गढ़ लिया
एक दूसरे को पढ़ लिया
उनके समक्ष सबकुछ रीत गया
उनका एहसास जीत गया .   

राजनीति

                                                                                                                                                                   

यह कहते हैं
' नीति का जहां होता है अंत
होती है वहीँ राजनीति की शुरुवात '
राजनीति के गुरु बृहस्पति ने कहा है
राजनीति का मूल मंत्र है
' किसी पर बिश्वास मत करो '
तब राजनेता को क्यों कोसते हैं
राजनेता का जनता के साथ प्रतिकूल ब्यवहार
मूल मंत्रो के आधार पर उचित है
राजनेताओं का जनता से सम्पर्क
मात्र वोट तक अनुचित है
कुछ नेताओं के स्वार्थ लिप्सा मनमानी के कारण
देश निरन्तर रसातल की ओर बढ़ रहा है
छल कपट द्रोह हिंसा का पारा
दिनोदिन चढ़ रहा है
हम जागें नेता को जगाएं
राष्ट्र कल्याण के लिए
नेता की अकर्मण्यता को भगाएं
देश-प्रेम सर्वोपरि है
राष्ट्रीयता में राजनीति
लाती है दुर्गति
यह महापुरुषों की वाणी है
इसे करना होगा साकार
हम नहीं हैं लाचार
उसमे अदभूत शक्ति निहित है
जो करते हैं देश से प्यार
मानव-धर्म को माने 
अपनी शक्ति पहचाने।  


   

Saturday, 1 June 2013

आई पी एल



देश के लाखों लोगों का 
खेल प्रेमियों का  
प्रिय मनोरंजक खेल 
आईपीएल 

खेल देखकर 
समझ जाते थे 
कौन जीतेगा 
वे न तो ज्योतिषी थे 
और न ही खेल विशेषज्ञ 

वर्षों पहले क्रिकेट खेल में 
खेल फिक्सिंग 
स्पॉट फिक्सिंग 
की चर्चा थी आई 
कोई ठोस निर्णय नहीं निकल पाया 
जनता ने उसे भुलाया
इस बार के आईपीएल में
पुनः सट्टेबाजी  की बात
खेल प्रेमियों को लगा आघात 
यह साफ हो गया 
क्रिकेट के सट्टेबाजी हमाम में सब नंगे हैं 

खेल ख़त्म हो गया 
सट्टेबाजी पर खुलकर हो रही है 
जोरदार बहस 
कहीं ये न कर दे 
खेल को ही तहस-नहस 
सट्टेबाज अब किसपर  सट्टा लगायेंगे 
आईपीएल में देश के लाखों अधेड़ 
'चीयर लीडर्स' को मटकते कैसे देख पायेंगे 
'नाइट पार्टीज' का क्या होगा 
बड़े लोग अधिक पैसेवाले लोग 
दीख रहें हैं परेशान 
आम जनता का टूट गया अरमान 

यह बात समझ में आ गई 
लाखों कमाने के लिए 
क्रिकेट खेल देखिए 
एक ही रात में
मालामाल हो जाइएगा 
अन्य खेलों में क्यों समय गंवाइएगा 
काफी खर्च कर 
अन्य काम छोड़कर 
मात्र क्रिकेट खेल देखिए 
रात भर जागकर आनंद उठाइए 
दिन में भले ही कार्यालय में ऊंघते रहिए 
आप भी सट्टा लगाइए 
खूब धन कमाइए 
खेल सौहार्द्य प्रेम और अपनापन का प्रतीक होता है 
क्रिकेट खेल में यह तो भूल ही जाइए .     




न जाने किसकी है बारी



दिनों दिन
बढ़ता जा रहा है
माओवादी
आतंकवाद का तांडव
भयभीत है मानव
छोटे-छोटे हमले से शुरू होकर
अब होने लगे हैं
बर्बर हमले
देश की आन्तरिक सुरक्षा को
सबसे बड़ा खतरा
वामपंथी अतिवाद
नक्सलवाद का गहराता साया
साफ  साफ नज़र आता है
कारण है
केंद्र तथा राज्यों में
राजनीतिक इक्षा शक्ति का अभाव
धीरे धीरे पसरता जा रहा है
नक्सली प्रभाव
आज सबसे बड़ी समस्या
आतंकवाद से भी बड़ी समस्या
नक्सली हिंसा है
बुरी तरह कुछ राज्य इसमे फसा है
इस विनाशकारी घड़ी में
सरकार
सुरक्षाबलों
खूफिया एजेंसियों
राजनीतिक कार्यकर्ताओं और आमजन
अपने कर्तव्यबोध को जानें
यही निर्णायक घड़ी है
यह मानें
अक्षम्य भयावह चूक से बचें
ठोस आर-पार की कारवाई हो
जो जनता को जँचे
सर के ऊपर से बहने लगा है पानी
उसे अपनी औकात दिखाएं
हिंसा की  फिर वारदात  न करने पाए
यह सोचना लाजिम है
कल थी छत्तीसगढ़ की  बारी
आने वाले दिन में
न जाने किस राज्य की है पारी .